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महापुरुषों से प्रेरणा लेकर समाजोत्थान की दिशा में आगे बढें।

कोई भी व्यक्ति अथवा समाज अपने अतीत और पूर्वजों से प्रेरणा लेता है और पूर्वजों, महापुरुषों और ऋषि मुनियों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों और उनके द्वारा बताये गए रास्तों पर चल कर ही प्रगति के सोपान तय करता है। लेकिन विश्वकर्मा समाज के लोगों ने इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जिसके कारण हम लोग आजादी के 70 वर्षों के बाद भी अपने आपको अति पिछडा वर्ग में पाते हैं। स्मरण रहे कि आदि शंकराचार्य जो विश्वकर्मा वंशी रहे ने देश के भूभाग के चारों कोनों पर चार पीठों की स्थापना की और समाज को संगठित कर आध्यात्मिक शिखर पर ले जाने का कार्य किया। उनके बाद अनेकों शंकराचार्य भी विश्वकर्मा वंशी रहे। जिन्होंने समाज को दिशा दी। आध्यात्मिक क्षेत्र में देश ही नहीं विदेशों में भी अपना झंडा गाडने वाले गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य श्री राम शर्मा ने समाज में आयी विकृतियां दूर कर आध्यात्मिक चेतना जाग्रत कर संगठित करने का कार्य किया और धार्मिक अनुष्ठानों में अपना एकाधिकार बनाए रखने वाले पोंगा पण्डितों का वर्चस्व तोड़कर समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को पांण्डित्य कर्म की शिक्षा दी। आज गायत्री परिवार से जुडे हजार...

स्वतंत्रता के 71 वर्ष और विश्वकर्मा समाज

वर्तमान समय से 71 वर्ष पूर्व जब 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वाधीनता प्राप्त हुई थी। तब भारत की राजनैतिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। तब से आज 71 वर्षों के अन्तराल में वैश्विक परिवेश में भारत की राजनैतिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति में धरती-आकाश का अंतर आ चुका है। यह परिवर्तन दर्शाता है कि इन 71 वर्षों के अंतराल में भारत में निवास करने वाले लोगों के जीवन स्तर में व्यापक परिवर्तन आया है। लेकिन इतने सब परिवर्तनों के मध्य विश्वकर्मा समाज की राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं आ सका है। विश्वकर्मा समाज की इस परिस्थिति के जिम्मेदार जितने सत्ताधारी लोगों द्वारा की गई उपेक्षा रही है। उतनी ही स्वयं समाज के लोगों की मानसिकता भी। समाज को लोगों की मानसिकता रही है कि वह सिंहासन चाहे स्वर्ण का बनाएं या लौह का अथवा लकड़ी का वह बैठने का अधिकार सदैव दूसरे को दे देते हैं। विश्वकर्मा समाज द्वारा निर्मित सिंहासनों से सुसज्जित राजसभाओं में कभी किसी सिंहासन पर बैठने का अधिकार विश्वकर्मा समाज को नहीं मिला। क्योंकि यह अधिकार कभीं हमने चाहा ही नहीं। विश्वकर्मा समा...